महेशपुर में ₹24.80 लाख का सरकारी भवन 'कीचड़' के हवाले, ठेकेदार लापता, 3 बिचौलियों ने लूट ली योजना की मर्यादा
सोमवार, 18 मई 2026
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महेशपुर : सरकारी सिस्टम में भ्रष्टाचार किस कदर अपनी जड़ें जमा चुका है, इसका एक जीता-जागता और शर्मनाक नमूना महेशपुर प्रखंड की रामपुर पंचायत के रामपुर गाँव में देखने को मिल रहा है। यहाँ ग्रामीण महिलाओं को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने के नाम पर आने वाली सरकारी राशि को सीधे 'भ्रष्टाचार के नाले' में बहाया जा रहा है।
मामला डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन ट्रस्ट फंड से बनने वाले स्वयं सहायता प्रशिक्षण भवन का है, जिसकी प्राक्कलित राशि ₹24,80,000 (चौबीस लाख अस्सी हजार रुपये) है। लेकिन धरातल पर इस योजना की जो दुर्दशा की जा रही है, उसे देखकर किसी का भी माथा ठनक जाएगा। यहाँ विकास की इमारत किसी ठोस जमीन पर नहीं, बल्कि सीधे पानी भरे दलदल और कीचड़ के ऊपर खड़ी की जा रही है।
सिस्टम से टूटा जनता का भरोसा: "सरकारी कर्मचारी अंधे हैं क्या, जो हम अपनी जान जोखिम में डालें?"
इस पूरे मामले में सबसे दर्दनाक और चौंकाने वाला पहलू तब सामने आया, जब इस संवाददाता ने गाँव के लोगों से उनकी राय जाननी चाही। सरकारी तंत्र की अनदेखी और बिचौलियों की दबंगई ने आम ग्रामीणों के भीतर इस कदर बेबसी और अविश्वास भर दिया है कि वे अब इस व्यवस्था से पूरी तरह कतराने लगे हैं।
गाँव के चौक-चौराहों पर खड़े कुछ बुजुर्गों और युवाओं ने बेहद तीखे और बेबाक लहजे में अपनी भड़ास निकालते हुए कहा:
"इस सरकारी योजना के बारे में हमें कोई जानकारी ही नहीं दी गई है, तो फिर हमको इससे क्या मतलब? जो मलाई (लाभ) खा रहे हैं, वो खाएं, हम लोग क्या कर सकते हैं? हम सीधे-साधे गरीब लोग हैं, रोज कमाते हैं, खाते हैं और अपने घर में रहते हैं। हमें यहाँ किसी से लड़ना भी नहीं है और न ही किसी से कोई मतलब रखना है।"
प्रशासन और विभाग के लापरवाह रवैये पर सीधा प्रहार करते हुए ग्रामीणों ने आगे कहा:
"जब यह सरकारी योजना है, तो सरकारी कर्मचारी और अधिकारी आकर इसे क्यों नहीं देखते? क्या उन लोगों को यह दलदल और घटिया काम नजर नहीं आता? जब मोटी तनख्वाह उठाने वाले अधिकारियों को ही यह भ्रष्टाचार दिखाई नहीं दे रहा है और वो आँखें मूंदकर बैठे हैं, तो हम गाँव वाले अपनी जान जोखिम में डालकर आगे क्यों बोलते जाएं? हमें किसी बिचौलिए या गुंडे से बैर नहीं मोल लेना है।"
ग्रामीणों का यह बयान साफ बयां करता है कि प्रखंड से लेकर जिला स्तर के अधिकारियों की लापरवाही के कारण आज आम जनता का सरकारी तंत्र से भरोसा पूरी तरह उठ चुका है।
इंजीनियरिंग का अनोखा 'अजूबा': पानी में डूबी है इमारत की बुनियाद
जब हमारी संवाददाता ने इस निर्माण कार्य की पड़ताल की, तो तकनीकी नियमों का कबाड़ा होते साफ दिखा। किसी भी पक्के निर्माण का पहला नियम होता है—जमीन का समतलीकरण और जल निकासी। लेकिन रामपुर गाँव में ठेकेदार और बिचौलियों ने अपनी जेबें भरने की जल्दी में इस बुनियादी नियम को ही दफन कर दिया।
तस्वीरें गवाही दे रही हैं कि जहाँ पिलर और बीम ढाले गए हैं, वहाँ घुटने भर पानी और कीचड़ जमा है। जमीन से काफी नीचे, एक गहरे गड्ढे में कंक्रीट का ढांचा खड़ा कर दिया गया है। कीचड़ के सीधे संपर्क में आने से सीमेंट की पकड़ खत्म हो चुकी है। बिना पानी सुखाए और बिना बालू-मिट्टी भरकर बेस मजबूत किए ही दीवारें खड़ी की जा रही हैं। यह कोई निर्माण नहीं, बल्कि सरकारी पैसे की 'बलि' दी जा रही है। ऐसी कमजोर बुनियाद पर बनने वाला भवन उद्घाटन से पहले ही जमींदोज हो जाए, तो कोई बड़ी बात नहीं होगी।
अदृश्य' ठेकेदार, 'सक्रिय' दलाल: पर्दे के पीछे से चल रहा है सिंडिकेट
इस पूरे खेल की क्रोनोलॉजी को समझें तो यह शुद्ध रूप से एक 'कागजी टेंडर घोटाला' नजर आता है। ग्रामीणों और स्थानीय बच्चों से मिली गोपनीय जानकारी के मुताबिक, यह टेंडर कागजों पर 'नसीम चीलमपुर' नाम के संवेदक (ठेकेदार) के नाम पर आवंटित हुआ है। लेकिन धरातल की हकीकत यह है कि असली ठेकेदार ने आज तक इस साइट पर अपना चेहरा नहीं दिखाया है।
साइट पर 3 रसूखदार बिचौलिए (दलाल) एक्टिव हैं, जो लेबर और मटीरियल को हैंडल कर रहे हैं। चूंकि इन बिचौलियों की कोई प्रशासनिक जवाबदेही नहीं है, इसलिए इनका एकमात्र मकसद सिर्फ और सिर्फ लागत घटाकर मुनाफा कमाना है। यही वजह है कि यहाँ न तो सही अनुपात में सीमेंट का इस्तेमाल हो रहा है और न ही अच्छी क्वालिटी की ईंटें लगाई जा रही हैं।
जनता को 'अंधेरे' में रखने की साजिश: कहाँ गायब है साइन बोर्ड?
सरकारी गाइडलाइन कहती है कि कार्यस्थल पर 'नागरिक सूचना पट्ट' लगाना अनिवार्य है, ताकि पारदर्शिता बनी रहे। लेकिन रामपुर के इस निर्माण स्थल पर ऐसा कोई बोर्ड दूर-दूर तक नहीं है। बिचौलियों ने जानबूझकर कोई बोर्ड नहीं लगाया ताकि आम जनता को योजना की लागत, विभाग का नाम और ठेकेदार के बारे में पता न चल सके। यही कारण है कि गाँव के लोग इस काम को किसी का निजी आवास समझकर चुप बैठे रहे।
सीधे सवाल आखिर मौन क्यों है पाकुड़ प्रशासन?
24.80 लाख रुपये के इस महाघोटाले पर कई तीखे सवाल खड़े होते हैं, जिनका जवाब पाकुड़ जिला प्रशासन और संबंधित विभाग को देना होगा:
कहाँ हैं कनीय अभियंता ? क्या सरकारी बाबू सिर्फ दफ्तर में बैठकर ही इस दलदल वाले निर्माण की 'मापी पुस्तिका' भर रहे हैं?
बिना निरीक्षण के भुगतान कैसे? क्या इस घटिया निर्माण को बिना देखे ही सरकारी खजाने से राशि विमुक्त करने की तैयारी है?
लाइसेंस किसी का, काम किसी का क्यों? नियमतः पेटी-कॉन्ट्रैक्ट या बिचौलियों से काम कराना अवैध है, तो फिर 3 दलाल सरेआम साइट पर क्या कर रहे हैं?
अब जागना होगा प्रशासन को
रामपुर गाँव के लोगों की बेबसी यह चीख-चीख कर कह रही है कि अगर भ्रष्ट बिचौलियों पर लगाम नहीं कसी गई, तो सरकारी योजनाएं इसी तरह दम तोड़ती रहेंगी। अब देखना यह होगा कि आम जनता के इस तीखे आक्रोश और बेबसी भरे बयान के बाद जिला प्रशासन गहरी नींद से जागता है, या फिर इस ₹24.80 लाख के सरकारी भवन को भ्रष्टाचार के इस दलदल में जमींदोज होने के लिए छोड़ दिया जाता है।
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