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डिजिटल इंडिया और सरकारी योजनाओं की पोल खोलती कदमपुर की दास्तान दोनों आंखों से लाचार, पर फाइलों में गायब हैं तालामुकु सोरेन

डिजिटल इंडिया और सरकारी योजनाओं की पोल खोलती कदमपुर की दास्तान दोनों आंखों से लाचार, पर फाइलों में गायब हैं तालामुकु सोरेन

महेशपुर :देश भर में 'डिजिटल इंडिया', 'सबका साथ, सबका विकास' और हर जरूरतमंद तक सरकारी योजनाओं को पहुंचाने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। सरकारी तंत्र की कागजी फाइलों में विकास की गंगा भले ही बहती दिखती हो, लेकिन धरातल की सच्चाई इन दावों के बिल्कुल उलट है। झारखंड के पाकुड़ जिले के अंतर्गत आने वाले महेशपुर प्रखंड की खापुर पंचायत के कदमपुर गांव की एक बानगी इसका जीवंत उदाहरण है, जहां सरकार की कल्याणकारी योजनाएं आज भी अंधेरे में भटक रही हैं।

इस गांव की निवासी तालामुकु सोरेन उम्र करीब 35 वर्ष से अधिक आज अपनी लाचारी और व्यवस्था की उदासीनता के बीच जीने को मजबूर हैं। विडंबना यह है कि तालामुकु सोरेन बचपन से ही दोनों आंखों से देख नहीं पाती हैं; जन्म के कुछ ही वर्षों बाद उनकी आंखों की रोशनी हमेशा के लिए छिन चुकी थी। इस गंभीर शारीरिक अक्षमता के बावजूद, आधुनिक भारत के डिजिटल सिस्टम और स्थानीय प्रशासनिक अमले की नजरों में उनका कोई वजूद नहीं है।

बुनियादी दस्तावेजों का अभाव: न आधार, न राशन, न दिव्यांग प्रमाण पत्र

आज के दौर में जहां हर छोटी-सुविधा के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य कर दिया गया है, वहीं तालामुकु सोरेन के पास पहचान का यह मुख्य दस्तावेज तक नहीं है। आधार कार्ड के अभाव में उनका न तो राशन कार्ड बन पाया है और न ही उन्हें राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत मिलने वाले खाद्यान्न का कोई लाभ मिल रहा है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक नेत्रहीन महिला, जो अपनी जिंदगी के 35 से अधिक साल गुजार चुकी है, उसका दिव्यांग प्रमाण पत्र आज तक क्यों नहीं बन सका? स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन की सुस्ती का खामियाजा इस आदिवासी महिला को भुगतना पड़ रहा है। बिना प्रमाण पत्र के वह राज्य सरकार की ओर से मिलने वाली दिव्यांग पेंशन या अन्य सहायता से कोसों दूर हैं।

अपनों का सहारा और व्यवस्था की बेरुखी

तालामुकु सोरेन का जीवन केवल शारीरिक अंधेरे तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति भी बेहद दयनीय है। उनका विवाह नहीं हुआ है और उनके देखभाल करने वाला भी कोई प्रत्यक्ष रूप से नहीं है। परिवार के नाम पर वह अपने बड़े भाई के सहारे जीवन काट रही हैं। भाई और उनके परिवार का जितना सामर्थ्य है, वे उतना सहयोग करते हैं, लेकिन एक गरीब परिवार के लिए जीवनयापन के संघर्ष के बीच एक नेत्रहीन सदस्य का पूरा बोझ उठाना बेहद कठिन होता है।

दिनभर वे अपने बड़े भाई के घर के एक कोने में बैठने को मजबूर रहती हैं। न तो उनके पास अपनी आजीविका का कोई साधन है और न ही सरकार की ओर से मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का संबल।

सिर्फ वोटर आईडी कार्ड बना, पर हक नहीं मिला

इस पूरे मामले में एक हैरान करने वाला पहलू यह भी है कि तालामुकु सोरेन के पास वोटर आईडी कार्ड अवश्य मौजूद है। लोकतंत्र के इस महापर्व में अपना मत देने के लिए उनका नाम मतदाता सूची में दर्ज है और उनका पहचान पत्र भी बन चुका है। लेकिन विडंबना देखिए कि चुनाव के समय वोट के लिए वे शासन-प्रशासन को याद रहती हैं, पर जब बात उनके बुनियादी अधिकारों, जीने के साधनों और सरकारी योजनाओं के लाभ की आती है, तो पूरा तंत्र आंखें मूंद लेता है।

क्या वोटर आईडी कार्ड बन जाने मात्र से एक लाचार, नेत्रहीन और बेसहारा महिला का जीवनस्तर सुधर जाएगा? क्या जनप्रतिनिधियों और स्थानीय प्रशासन का दायित्व सिर्फ चुनाव के वक्त वोट बटोरने तक सीमित है?

प्रशासनिक उदासीनता और सवालों के घेरे में पंचायत व्यवस्था

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार इस परिवार की दयनीय स्थिति को लेकर चर्चा की, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। खापुर पंचायत के प्रतिनिधि हों या प्रखंड विकास कार्यालय के अधिकारी, किसी ने भी इस बात की सुध नहीं ली कि कदमपुर गांव में एक ऐसी आदिवासी महिला भी रहती है जो दो वक्त की रोटी और बुनियादी अधिकारों के लिए मोहताज है।

सरकार चाहे जितने भी दावे कर ले, लेकिन जब तक जमीनी स्तर पर ऐसे मामलों की पहचान कर त्वरित कार्रवाई नहीं होती, तब तक इस तरह के अभियान खोखले ही नजर आएंगे।

अब देखना यह है कि जागेगा या नहीं प्रशासन?

तालामुकु सोरेन की यह मार्मिक कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की लाचारी नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे प्रशासनिक और सामाजिक ढांचे के माथे पर एक कलंक की तरह है। इस खबर के माध्यम से जिला प्रशासन, पाकुड़ के उपायुक्त और महेशपुर प्रखंड विकास पदाधिकारी से यह पुरजोर मांग की जाती है कि इस मामले का संज्ञान लिया जाए।

विशेष कैंप लगाकर तालामुकु सोरेन का तत्काल आधार कार्ड बनवाया जाए।

प्रक्रिया को सरल बनाते हुए उनका दिव्यांग प्रमाण पत्र और राशन कार्ड निर्गत किया जाए। 

उन्हें पात्रता के आधार पर दिव्यांग पेंशन और अन्य कल्याणकारी योजनाओं से तुरंत जोड़ा जाए ताकि इस आदिवासी महिला को जीवन के इस पड़ाव पर थोड़ी राहत मिल सके।

अब देखना यह होगा कि इस नकारात्मक और तीखी खबर के प्रकाशित होने के बाद क्या कुंभकर्णी नींद में सोया प्रशासनिक तंत्र जागता है या फिर तालामुकु सोरेन की लाचारी यूं ही कागजों के फेर में दम तोड़ती रहेगी।

बिना दस्तावेजों वाली दिव्यांग और बेसहारा महिला के मामलों पर प्रशासन का सकारात्मक रुख

एक दिव्यांग और बेसहारा महिला के पास पहचान पत्र या अन्य आवश्यक दस्तावेज न होने की स्थिति में, प्रशासन की ओर से मदद की उम्मीद जगी है। ऐसे मामलों के समाधान और दस्तावेजों की प्रक्रिया को लेकर जब सीओ संजय कुमार सिंह से बातचीत की गई, तो उन्होंने इस पर त्वरित कार्रवाई का आश्वासन दिया।

अधिकारी का बयान
सीओ संजय कुमार सिंह ने आश्वस्त किया कि दो दिन की छुट्टी के बाद, महिला का दिव्यांग प्रमाण पत्र और अन्य जरूरी कागजात प्राथमिकता के आधार पर बनवा दिए जाएंगे।

वहीं, बीडीओ डॉ. सिद्धार्थ शंकर यादव ने बताया कि कदमपुर गांव की नेत्रहीन महिला ताला-मुकु सोरेन के 35 वर्षों से बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहने का मामला उनके संज्ञान में नहीं था। पंचायत सचिव से रिपोर्ट मंगाई जा रही है, जिसके बाद उन्हें आधार कार्ड और राशन कार्ड समेत सभी सरकारी योजनाओं का लाभ तुरंत दिलाया जाएगा।

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