डोमगढ़ बचाओ: प्रशासन की चुप्पी टूटेगी या जनता का सब्र? – अंतिम सांस तक मैदान नहीं छोड़ेंगे!
शुक्रवार, 2 जनवरी 2026
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रवि फिलिप्स (ब्यूरो चीफ धनबाद) भानुमित्र न्यूज़🖋️
सिंदरी : डोमगढ़ बचाओ मोर्चा का अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन अपने तेरहवें दिन भी पूरी दृढ़ता और अनुशासन के साथ जारी है। डोंगर क्षेत्र के निवासी अपनी जायज मांगों को लेकर एकजुट हैं तथा शांतिपूर्ण तरीके से अपना विरोध व्यक्त कर रहे हैं। धरना स्थल पर उपस्थित लोगों की बढ़ती संख्या और उनका संयम इस बात का स्पष्ट संकेत है कि यह आंदोलन व्यापक जनसमर्थन प्राप्त कर चुका है तथा इसे नजरअंदाज करना प्रशासन के लिए कठिन होगा।
आज धरना स्थल पर तेरहवें दिन दिलीप मिश्रा सहित मुनिरका सिंह, शशि शेखर पाण्डे, परशुराम, टिंकू सिंह, अनिल सिंह, हरेंद्र सिंह, नाग मनी भारती, अनिल शाह तथा पूर्व सीआईएसएफ कमांडेंट अनुराग जैसे अनेक सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय नागरिक बड़ी संख्या में मौजूद रहे। सभी ने मांगों को न्यायसंगत बताते हुए प्रशासन से शीघ्र संवाद और समाधान की अपील की।
खास तौर पर दिलीप मिश्रा ने धरना स्थल को संबोधित करते हुए कड़े शब्दों में कहा— “यह धरना कोई साधारण प्रदर्शन नहीं है। यह उन लोगों की लड़ाई है जिन्हें सालों से ठगा गया है। प्रशासन अगर यह सोचता है कि थक-हारकर हम चले जाएंगे, तो वह भारी भूल कर रहा है। हम अंतिम सांस तक लड़ेंगे। मांगें पूरी होंगी, अन्यथा यह आंदोलन पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लेगा। जनता जाग चुकी है—अब कोई नहीं सोएगा!”
आंदोलन की मुख्य मांगें
- ओबी डंप योजना का पूर्ण निरस्तीकरण। टासरा कोल परियोजना के ओवरबर्डन को डोंगर क्षेत्र में डालने की योजना को तत्काल रद्द किया जाए, ताकि एफसीआई क्वार्टर और अन्य आवास सुरक्षित रहें।
- विस्थापन पर पूर्ण रोक: लगभग तीन हजार परिवारों के संभावित विस्थापन को रोका जाए तथा लोगों को उनकी पुश्तैनी भूमि पर रहने का अधिकार मिले।
- प्रशासन से खुला संवाद: योजना पर पुनर्विचार हो और स्थानीय लोगों से वार्ता के माध्यम से समाधान निकाला जाए।
आयोजन समिति ने पुनः स्पष्ट किया कि आंदोलन पूर्णतः शांतिपूर्ण और अनुशासित है तथा मांगें पूरी होने तक जारी रहेगा। तेरहवें दिन की भारी उपस्थिति ने यह संदेश दे दिया कि जनता अपनी आवाज को बुलंद रखेगी।
प्रशासन के लिए यह उचित समय है कि वह मुद्दे की गंभीरता को समझे और संवाद का मार्ग अपनाए। अन्यथा मामला और जटिल हो सकता है, जबकि बातचीत से ही स्थायी और न्यायपूर्ण हल संभव है।
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