झरने से 2 किलोमीटर की दूरी खत्म, पहाड़िया परिवारों के घरों तक पहुंचा पानी
गुरुवार, 27 अगस्त 2026
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लिट्टीपाड़ा : पाकुड़ जिले के लिट्टीपाड़ा प्रखंड के पहाड़ी इलाकों में रहने वाले पहाड़िया (पीवीटीजी) समुदाय के लिए पेयजल की समस्या लंबे समय से बड़ी चुनौती बनी हुई थी। घने जंगल कभी समुदाय की कई जरूरतें पूरी करते थे, लेकिन बदलते समय के साथ भोजन और पेयजल की उपलब्धता कठिन होती गई। पहाड़ों पर बसे परिवारों को पानी के लिए घरों से करीब 1.5 से 2 किलोमीटर नीचे स्थित झरने तक जाना पड़ता था।
पानी लाने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से महिलाओं पर थी। पथरीली और ढलान वाली पहाड़ी राह पर झरने तक पहुंचने में उन्हें करीब 45 मिनट से एक घंटे तक पैदल चलना पड़ता था। एक बार में लगभग 10 लीटर पानी लेकर वापस घर पहुंचना पड़ता था। परिवार की दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए महिलाओं को दिन में 3 से 4 बार यह सफर करना पड़ता था। इस तरह 5 से 6 सदस्यों वाले एक परिवार को प्रतिदिन करीब 30 से 40 लीटर पानी जुटाने की आवश्यकता होती थी। इसी पानी का इस्तेमाल पीने, खाना बनाने, बर्तन धोने और रोजमर्रा की अन्य जरूरतों के लिए किया जाता था।
समुदाय की इस कठिनाई को प्रवाह ने गंभीरता से महसूस किया और टाटा ट्रस्ट्स के सहयोग से समाधान की दिशा में पहल शुरू की। इसके तहत झरने के जलस्रोत को साफ-सुथरा करने के साथ पाइपलाइन के माध्यम से करीब 2,000 फीट की ऊंचाई पर बसे घरों तक पानी पहुंचाने में सफलता हासिल की गई। घर के नजदीक पानी पहुंचने से अब महिलाओं को प्रतिदिन पहाड़ी ढलान पर लंबी दूरी तय कर पानी लाने की मजबूरी से काफी राहत मिली है।
जलस्रोत को लंबे समय तक सुरक्षित और टिकाऊ बनाए रखने के लिए ट्रेंच कटिंग के माध्यम से भूजल रिचार्ज प्रणाली विकसित करने तथा सामुदायिक संरक्षण पर भी काम किया जा रहा है। इसके साथ ही प्रत्येक गांव में जल उपभोक्ता समूह का गठन किया गया है। यह समूह जलस्रोत और पानी पहुंचाने वाली व्यवस्था के नियमित रखरखाव के साथ सामुदायिक योगदान सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी निभाएगा।
प्रवाह की टीम मासिक फॉलो-अप और जल उपभोक्ता समूह की बैठकों के माध्यम से समुदाय के लोगों को जलस्रोत के सामूहिक संरक्षण और रखरखाव के लिए सक्षम बना रही है। इसका उद्देश्य केवल घरों तक पानी पहुंचाना ही नहीं, बल्कि समुदाय को जल व्यवस्था की जिम्मेदारी से जोड़कर इसे लंबे समय तक कायम रखना भी है।
घर तक पानी पहुंचने से पहाड़िया परिवारों में राहत और खुशी का माहौल है। महिलाओं का समय और श्रम बच रहा है, जिसका उपयोग अब परिवार खेती-बाड़ी और आजीविका से जुड़े कार्यों में अधिक कर पा रहे हैं। लंबे समय से पानी के लिए पहाड़ी रास्तों पर घंटों मेहनत करने वाले परिवारों के लिए यह पहल रोजमर्रा की जिंदगी में बड़ा बदलाव लेकर आई है।
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