डॉ. एम. पी. परमेश्वरन: जन - विज्ञान आंदोलन के अग्रणी - डॉ. काशी नाथ चटर्जी
गुरुवार, 27 अगस्त 2026
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सिंदरी :27 अगस्त 2026 को सिंदरी के गुरुद्वारा सहारपुरा मे ज्ञान विज्ञान समिति झारखंड जिला इकाई धनबाद द्वारा अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क व भारत ज्ञान विज्ञान समिति के संस्थापक सचिव डॉ. एम. पी. परमेश्वरन स्मृति में श्रद्धांजलि सभा की अध्यक्षता ज्ञान विज्ञान समिति झारखंड के उपाध्यक्ष हेमंत कुमार जायसवाल व संचालन ज्ञान विज्ञान समिति के सचिव भोला नाथ राम द्वारा किया गए ।
इस अवसर पर मुख्यरूप से भारत ज्ञान विज्ञान समिति के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. काशी नाथ चटर्जी, राष्ट्रीय कार्यकारिणी रवि सिंह मौजूद थे । उपस्थिति लोगों द्वारा डॉ. एम. पी. परमेश्वरन के तस्वीर पर माल्यार्पण के साथ दो मिनट का मौन के पश्चात श्रद्धांजलि सभी की शुरुआत की गई ।
डॉ. काशीनाथ चटर्जी ने अपने वक्तव्य में डॉ. एम. पी. परमेश्वरन को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा “डॉ. एम. पी. परमेश्वरन से मेरी पहली मुलाकात वर्ष 1990 में कौआकोल, नवादा में हुई थी। उनके प्रभाव से प्रेरित होकर मैं ज्ञान-विज्ञान आंदोलन से जुड़ा और आज भी इस आंदोलन के साथ सक्रिय रूप से कार्य कर रहा हूँ।”
वक्तव्य में डॉ. एम. पी. परमेश्वरन (18 जनवरी 1935–11 अगस्त 2026) को भारत के प्रख्यात परमाणु वैज्ञानिक, विज्ञान-प्रचारक, लेखक और जन-विज्ञान आंदोलन के अग्रणी कार्यकर्ता के रूप में स्मरण किया गया। उन्होंने अपना वैज्ञानिक करियर छोड़कर विज्ञान को आम जनता के जीवन और सामाजिक सरोकारों से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
डॉ. परमेश्वरन केरल शास्त्र साहित्य परिषद ( के एस एस पी) को व्यापक जन-विज्ञान आंदोलन के रूप में विकसित करने वाले प्रमुख व्यक्तियों में शामिल थे। उनका मानना था कि विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं और विश्वविद्यालयों तक सीमित न रहकर जनता की चेतना और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनना चाहिए।
राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने भारत जन विज्ञान जत्था, ऑल इंडिया पीपुल्स साइंस नेटवर्क (ए आई पी एस एन) तथा भारत ज्ञान विज्ञान समिति (बी जी भी एस) जैसे आंदोलनों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साक्षरता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, जनभागीदारी और सामाजिक परिवर्तन को एक-दूसरे से जोड़ना उनके जीवन-कार्य की विशिष्ट पहचान थी।
उनका लेखन भी इसी उद्देश्य से प्रेरित था। विज्ञान, पर्यावरण, शिक्षा, विकास और समाज से जुड़े जटिल विषयों को सरल भाषा में जनता तक पहुँचाना उनकी विशेषता थी। उनकी वैचारिक कृति “Fourth World” ने वैकल्पिक विकास, विकेंद्रीकरण और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया।
डॉ. परमेश्वरन की सबसे बड़ी विरासत यह है कि उन्होंने विज्ञान को जनता के बीच ले जाने को केवल विज्ञान-प्रचार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना और सामाजिक परिवर्तन का औजार बनाया।
विज्ञान → वैज्ञानिक दृष्टिकोण → साक्षरता → जागरूक नागरिक → जनभागीदारी → सामाजिक परिवर्तन की उनकी विचारधारा आज भी जन-विज्ञान और साक्षरता आंदोलनों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
प्रो. सरफुद्दीन एक वैज्ञानिक का जन्म समाज के समस्याओं से होती है । वर्ष 1975 में नौकरी छोड़ सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में विज्ञान को गांव - गांव तक पहुंचाने के लिए कार्य करना शुरू किए ।
रामचंद्र सिंह ने कहा कि डॉ. परमेश्वरन हमेशा यादों में रहेंगे , इनके सिद्धांत और कार्यों को जन जन तक पहुंचाना तभी सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।
प्रो. राजेंद्र मिश्रा द्वारा कहा गया कि जीवन में शिक्षा बहुत जरूरी है । ज्ञान हर क्षण , पग पग पर बिखरा हुआ है । इसे अर्जित कर अपने अंदर ग्रहण करना है ।
मुमताज आलम ने कहा कि डॉ. परमेश्वरन के सिद्धांतों व आदर्शों में चलना ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।
विकाश कुमार ठाकुर द्वारा कहा गया कि डॉ. परमेश्वरन को स्मृति को याद कर रहें है । उनके कार्यों को आगे बढ़ाएंगे तभी सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।
मदन प्रसाद , मिठू दास , रानी मिश्रा , सुरेश प्रसाद , सरदार गुरुचरण सिंह , अपने विचार रखे ।
श्रद्धांजलि सभा में निर्णय लिया गया कि विकाश कुमार ठाकुर जन वाचन के लिए सिंदरी में पुस्तकालय खोलेंगे , एम. पी. परमेश्वरन के स्मृति में पूरे देश में आठ सितम्बर अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस के अवसर पर गांव गांव तक जन वाचन कार्यक्रम करेंगे ।
धन्यवाद ज्ञापन त्रिभुवन चौधरी द्वारा किया गया ।
इस कार्यक्रम में सैंकड़ों लोग मौजूद थे ।
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