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महेशपुर के मुजिबुल: जब सिस्टम खामोश हुआ, तो एक 'मसीहा' ने थामी गरीबों की नब्ज

महेशपुर के मुजिबुल: जब सिस्टम खामोश हुआ, तो एक 'मसीहा' ने थामी गरीबों की नब्ज

महेशपुर : "अंधेरा घना है पर दीया जलाना कहाँ मना है..." इस फलसफे को अपनी जिंदगी का मकसद बना चुके हैं डांगा पाड़ा के मुजिबुल शेख। जहाँ आज चिकित्सा एक महंगा व्यापार बन चुकी है, वहीं पाकुड़ जिले के इस शख्स ने मानवता की एक ऐसी मिसाल पेश की है, जो सरकारी तंत्र और समाज, दोनों के लिए प्रेरणा है।

सांसों पर पहरा था, मुजिबुल ने दिया जीवनदान

गरीबी की मार झेल रहे उन परिवारों के लिए मुजिबुल शेख किसी फरिश्ते से कम नहीं हैं, जो हृदय रोग और स्नायु रोग जैसी जानलेवा बीमारियों से जूझ रहे हैं। अक्सर आर्थिक तंगी के कारण महेशपुर के दूर-दराज गांवों के लोग इलाज के अभाव में घुट-घुट कर जीने को मजबूर थे। लेकिन मुजिबुल ने इन लाचार मरीजों का हाथ थामकर उन्हें मौत के मुंह से बाहर निकाला है।

आयुष्मान कार्ड की ताकत और मुजिबुल का सा

मुजिबुल ने केवल जज्बा ही नहीं दिखाया, बल्कि एक सटीक 'सिस्टम' तैयार किया है ताकि मदद सही जगह पहुंचे:
ब्रिज का काम: मुजिबुल ग्रामीण मरीजों और आधुनिक चिकित्सा के बीच एक सेतु की भूमिका निभाते हैं।
दुर्गापुर के बड़े अस्पतालों में इलाज: वे मरीजों का आयुष्मान कार्ड लेकर उन्हें पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर स्थित अत्याधुनिक निजी अस्पतालों में भर्ती कराते हैं।
सफल सर्जरी: अब तक दर्जनों मरीज, जो चलने-फिरने से लाचार थे या जिनकी धड़कनें कमजोर पड़ रही थीं, मुजिबुल की मदद से सफल ऑपरेशन कराकर आज अपने परिवार के साथ खुशहाल जीवन जी रहे हैं।
"जब कोई मरीज स्वस्थ होकर अपने घर लौटता है, तो उसके चेहरे की मुस्कान में मुझे खुदा की इबादत नजर आती है। बस यही सुकून मुझे इस कार्य के लिए और ऊर्जा देता है।"
— मुजिबुल शेख

बिना किसी स्वार्थ के 'सेवा परमो धर्म'

सबसे काबिल-ए-तारीफ बात यह है कि मुजिबुल यह सारी भाग-दौड़ और मदद बिल्कुल निशुल्क करते हैं। बिना किसी राजनीतिक लाभ या व्यक्तिगत स्वार्थ के, वे दिन-रात मरीजों की सेवा में तत्पर रहते हैं। आज पूरे महेशपुर ब्लॉक में उनके इस निस्वार्थ जज्बे की चर्चा है और हर कोई इस 'मसीहा' को सलाम कर रहा है।

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