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वादों के तालाब में डूबी सिंदरी की सड़क, हर बारिश में बह जाती है विकास की उम्मीद

वादों के तालाब में डूबी सिंदरी की सड़क, हर बारिश में बह जाती है विकास की उम्मीद


रवि फिलिप्स (ब्यूरो चीफ धनबाद) भानुमित्र न्यूज़🖋️
सिंदरी:_बादल जब भी बरसे हैं सिंदरी नगर में,_  
_सड़कें नहीं, यहाँ तालाब उभरे हैं।_  
_वो वादे कहाँ गए जो चुनाव में हुए थे,_  
_हर गड्ढा पूछता है, 'हमारा उद्धार कब होगा'?_ 
सदियों से यही नज़ारा है, जब भी सिंदरी नगर में बादल मेहरबान होते हैं, तो सड़कें बदहाल हो जाती हैं। रोहड़ाबांध चौक की यह तस्वीर सिर्फ कीचड़ और पानी नहीं दिखाती, बल्कि उन वादों की पोल खोलती है जो हर सरकार में किए गए, पर निभाए नहीं गए।

"शुद्धि लेने वाला कोई नहीं, पर वादा करने वाले बहुत आए"
रात के अंधेरे में दुकानों की रोशनी पानी में तैर रही है। लस्सी की दुकान के सामने, फल के ठेले के पास, हर जगह बस गड्ढे और जलभराव का साम्राज्य है। बाइक सवार संभल-संभल कर निकल रहे हैं, पैदल चलने वाले किनारा ढूंढ रहे हैं। 

_नेता आए, भाषण लाए, फीते काटे चले गए,_  
_गड्ढे वैसे के वैसे हैं, बस मौसम बदले गए।_  
-रोहड़ाबांध  का यह हाल पूछे, कब तक यूं ही सहेंगे?_  
_जनता की आहों से कब तक, ये रास्ते बहेंगे?_

स्थानीय लोगों का दर्द है कि चुनाव से पहले हर दल विकास का दामन थामे आता है। "सड़कें चमकेंगी", "सिंदरी बदलेगी" - नारे गूंजते हैं। पर बारिश की पहली बूंद के साथ ही सारी चमक कीचड़ में बदल जाती है। 

सवाल वही पुराना है:
_कितने मानसून और बीतेंगे,_  
_कितने वादे यूं ही रीतेंगे?_  
_इस खराब सड़क का उद्धार कब होगा,_  
_ये सवाल हर बूंद के साथ चीखेगा।_

सिंदरी रोहड़बांध चौक का यह मंजर सिर्फ एक सड़क की कहानी नहीं, बल्कि सिस्टम की लाचारी का आईना है। जब तक कागज़ों से उतरकर विकास ज़मीन पर नहीं आएगा, तब तक हर बारिश सिंदरी वालों के लिए परेशानी का सबब बनती रहेगी। 

_ऐ हुक्मरानों, अब तो जागो,_  
_वादों को ज़मीं पर लाओ।_  
_वरना जनता की खामोशी भी,_  
_एक दिन तूफान बन जाएगी।_

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