एल नीनो से बचाव को किसानों को वैज्ञानिक खेती का प्रशिक्षण
मंगलवार, 7 जुलाई 2026
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महेशपुर : बदलते मौसम और एल नीनो के संभावित प्रभावों के बीच किसानों की फसलों को सुरक्षित रखने तथा कम वर्षा की परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बिरसा कृषि विश्वविद्यालय ने एक महत्वपूर्ण पहल की। विश्वविद्यालय की ओर से गूगल मीट के माध्यम से झारखंड के सभी कृषि विज्ञान केंद्रों को जोड़कर विशेष जागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम के माध्यम से किसानों को वैकल्पिक खेती, कम वर्षा में उपयुक्त फसलों के चयन, जल संरक्षण और आधुनिक कृषि तकनीकों की विस्तृत जानकारी दी गई। इसी क्रम में कृषि विज्ञान केंद्र, पाकुड़ में वैज्ञानिकों एवं जिले के विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे किसानों ने कार्यक्रम में सक्रिय भागीदारी करते हुए विशेषज्ञों से सीधे संवाद किया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए बिरसा कृषि विश्वविद्यालय रांची के कुलपति डॉक्टर सुनील चंद्र दुबे, निदेशक प्रसार शिक्षा डॉक्टर डीके शाही तथा सह-निदेशक प्रसार शिक्षा डॉक्टर निरंजन लाल ने एल नीनो के संभावित प्रभावों से बचाव के लिए किसानों को मौसम आधारित खेती अपनाने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि कम वर्षा अथवा सूखे जैसी परिस्थितियों में अरहर, मूंग, उड़द, कुलथी जैसी दलहनी फसलों के साथ-साथ मडुआ, बाजरा तथा कम अवधि वाले धान की किस्में जैसे सहभागी धान, आईआर-64 डीआरटी तथा सीआर-320 का चयन किसानों के लिए अधिक लाभकारी सिद्ध हो सकता है। साथ ही पशुओं के चारे की उपलब्धता बनाए रखने के लिए नेपियर घास, ज्वार तथा बरसीम जैसे चारा फसलों की खेती करने की भी अनुशंसा की गई।
विशेषज्ञों ने किसानों को खेतों में वर्षा जल संरक्षण के लिए मेढ़ों को मजबूत बनाने और पानी रोकने की तकनीकों की जानकारी दी। वहीं अधिक वर्षा की स्थिति में खेतों से समय पर जल निकासी की व्यवस्था करने तथा सब्जियों की खेती मेढ़ों पर करने की सलाह दी गई, ताकि फसलों को जलभराव से होने वाले नुकसान से बचाया जा सके। कार्यक्रम के दौरान कृषि विज्ञान केंद्रों में कार्यरत वैज्ञानिकों को भी निर्देशित किया गया कि वे मौसम के अनुसार किसानों तक समय-समय पर वैज्ञानिक कृषि सलाह पहुंचाएं और खरीफ के साथ-साथ रबी मौसम की फसलों का चयन भी उपलब्ध संसाधनों एवं मौसम की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर कराने के लिए किसानों को प्रेरित करें।
कार्यक्रम में किसानों से विशेष आग्रह किया गया कि वे मौसम की परिस्थितियों के अनुरूप फसलों एवं किस्मों का चयन करें और वैज्ञानिक सलाह के आधार पर खेती करें। विशेषज्ञों ने इस बात पर भी जोर दिया कि किसानों और वैज्ञानिकों के बीच नियमित संवाद एवं अंतरमिलन कार्यक्रम लगातार आयोजित होते रहें, ताकि बदलती जलवायु के अनुरूप खेती की नई तकनीकों का लाभ प्रत्येक किसान तक पहुंच सके।
इस जागरूकता अभियान को व्यवहारिक रूप देने के लिए महेशपुर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र, पाकुड़ में किसानों के बीच कम अवधि वाले धान की सीधी बुआई की आधुनिक तकनीक का प्रदर्शन किया गया। वैज्ञानिकों ने ड्रम सीडर के माध्यम से खेत में धान की सीधी बुआई का प्रत्यक्ष प्रदर्शन करते हुए इसकी पूरी प्रक्रिया विस्तार से समझाई। किसानों को बताया गया कि इस तकनीक से कम पानी, कम श्रम और कम लागत में बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। साथ ही धान की उपयुक्त किस्मों, आवश्यक बीज की मात्रा, खेत की तैयारी तथा एल नीनो जैसी परिस्थितियों में इस तकनीक की उपयोगिता पर भी विस्तार से जानकारी दी गई।
इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में महेशपुर प्रखंड के देवीनगर स्थित प्रवाह के कृषि समन्वयक, किसान, मरियाम मयंडी, मुखिया तेलियापोखर पंचायत, ज्योतिका हांसदा, दीपा टुडू, मैनेजर हांसदा, मीरू सहित कुल 50 किसानों ने भाग लिया। सभी प्रतिभागी किसानों ने अपने-अपने क्षेत्रों में लौटकर यहां प्राप्त वैज्ञानिक जानकारी और आधुनिक कृषि तकनीकों को अन्य किसानों तक पहुंचाने का संकल्प लिया।
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