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महेशपुर में नशे का साइलेंट अटैक! डेंड्राइट और गोगो की गिरफ्त में आ रहा बचपन, क्या सो रहा है प्रशासन?

महेशपुर में नशे का साइलेंट अटैक! डेंड्राइट और गोगो की गिरफ्त में आ रहा बचपन, क्या सो रहा है प्रशासन?

महेशपुर : महेशपुर प्रखंड इन दिनों एक खामोश, लेकिन बेहद चिंताजनक खतरे से जूझ रहा है। यह खतरा न हथियारों से पैदा हो रहा है और न ही गोलियों की आवाज से, बल्कि डेंड्राइट और गोगो जैसे नशे के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पदार्थों के जरिए धीरे-धीरे बच्चों के भविष्य को प्रभावित कर रहा है। सबसे चिंता की बात यह है कि इस खतरे की चपेट में बड़े नहीं, बल्कि 10 से 13 वर्ष की उम्र के स्कूली बच्चे आते दिखाई दे रहे हैं। गांव की गलियों से लेकर स्कूल के आसपास तक बच्चों में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति के संकेत सामने आना समाज और प्रशासन दोनों के लिए गंभीर चेतावनी है।

हाल ही में छूकूधारा पंचायत के केराछत्तर गांव से करीब 12-13 वर्ष के एक नाबालिग बच्चे का वीडियो सामने आया है, जिसमें वह कथित तौर पर नशे का सेवन करता दिखाई दे रहा है। यह वीडियो एक बार फिर इस सवाल को खड़ा करता है कि आखिर महेशपुर प्रखंड के मासूम बच्चे इतनी कम उम्र में नशे की ओर कैसे बढ़ रहे हैं? इससे पहले भी स्कूल परिसर के अंदर बच्चों द्वारा डेंड्राइट जैसे चिपकाने वाले पदार्थ का नशे के रूप में इस्तेमाल किए जाने का वीडियो वायरल हुआ था। लगातार ऐसे मामले सामने आना बेहद चिंताजनक है।

साइकिल दुकानों तक पहुंच की आशंका, 100 रुपये में बिक्री का आरोप

नशे के इस मामले में खापुर पंचायत के मोहबोना गांव का चौक-चौराहा भी चर्चा में है। स्थानीय स्तर पर आरोप है कि कुछ साइकिल दुकानों में डेंड्राइट जैसे चिपकाने वाले पदार्थ आसानी से उपलब्ध हैं। बताया जाता है कि इन पदार्थों का इस्तेमाल साइकिल के पंचर बनाने और अन्य मरम्मत कार्यों में किया जाता है। इसी वजह से ये सामान दुकानों में रखे जाते हैं। लेकिन आरोप है कि कुछ बच्चे इन्हीं दुकानों से जाकर इस सामग्री को खरीदते हैं और इसके लिए कथित तौर पर 100 रुपये तक चुकाते हैं। इस आरोप की निष्पक्ष जांच जरूरी है कि आखिर दुकानों से यह सामग्री किन लोगों को और किन परिस्थितियों में बेची जा रही है।

किताब-कॉपी की उम्र में नशे की ओर क्यों बढ़ रहे बच्चे?

जिस उम्र में बच्चों को स्कूल जाना चाहिए, पढ़ाई करनी चाहिए और अपने भविष्य के सपने संजोने चाहिए, उस उम्र में उनका नशे जैसी खतरनाक प्रवृत्ति की ओर बढ़ना पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है। डेंड्राइट जैसे रासायनिक पदार्थों का नशे के रूप में इस्तेमाल बच्चों के स्वास्थ्य और मानसिक विकास पर गंभीर दुष्प्रभाव डाल सकता है। समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो इसका असर बच्चों की पढ़ाई, व्यवहार और भविष्य पर पड़ सकता है।

प्रशासन की भूमिका पर उठ रहे सवाल

लगातार वीडियो और स्थानीय शिकायतें सामने आने के बावजूद सवाल उठता है कि क्या संबंधित विभागों को इस स्थिति की जानकारी है? क्या साइकिल दुकानों और अन्य संबंधित दुकानों की जांच की जा रही है? क्या स्कूलों में बच्चों को नशे के दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करने के लिए कोई विशेष अभियान चलाया जा रहा है?
अब जिला प्रशासन, पुलिस विभाग, शिक्षा विभाग और बाल संरक्षण से जुड़े अधिकारियों को इस मामले में गंभीरता से संज्ञान लेने की जरूरत है। संबंधित दुकानों की जांच कराई जाए, नाबालिगों तक ऐसी सामग्री की पहुंच रोकने के लिए उचित कदम उठाए जाएं तथा बच्चों और उनके अभिभावकों के बीच जागरूकता अभियान चलाया जाए। साथ ही नशे की चपेट में आ रहे बच्चों को डांटने या दंडित करने के बजाय उनकी पहचान कर उचित परामर्श और सहायता उपलब्ध कराई जाए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर महेशपुर के बचपन पर मंडरा रहे इस खामोश खतरे को रोकने के लिए प्रशासन कब जागेगा? क्या किसी बड़ी घटना का इंतजार किया जा रहा है, या समय रहते बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे?

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